नीतीश कुमार और मोदी की जोड़ी! क्या इन दो वजहों से मिली प्रचंड जीत? नीतीश कुमार ने 10वीं बार जीत हासिल कर बनाया अविश्वसनीय रिकॉर्ड!
नीतीश कुमार भारतीय राजनीति में एक रंगीन और बेहद अहम शख्सियत हैं। उन्होंने बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का अनोखा रिकॉर्ड बनाया है। अक्सर सुर्खियों में रहने वाले इस दिग्गज नेता को उनकी राजनीतिक रणनीति, प्रशासनिक कौशल और लगातार गठबंधन बदलने के लिए जाना जाता है। उनके अनुयायी उन्हें ‘सुशासन बाबू’ कहते हैं, जबकि उनके आलोचक उन्हें ‘पलटू राम’ कहते हैं। लेकिन सबसे बढ़कर, नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने दशकों तक बिहार की राजनीति को नियंत्रित किया है। वे जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) का प्रमुख चेहरा हैं। उनके लंबे संघर्ष, अनुशासन और दृढ़ निश्चयी जीवनशैली के पीछे एक इंजीनियर से एक सफल राजनेता बनने का उनका सफर छिपा है। आज, 14 नवंबर 2025 को, बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने दिखा दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल की है। इस जीत के साथ, नीतीश कुमार 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने की ओर अग्रसर हैं, जो भारतीय राजनीति में एक नया कीर्तिमान है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले ‘महागठबंधन’ के ज़ोरदार प्रचार के बावजूद, बिहार की जनता ने अंततः नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ वाली छवि और एनडीए की संयुक्त ताकत पर भरोसा जताया। अंतिम चुनाव परिणाम (एक नज़र में) * कुल सीटें:- 243 * सरकार बनाने का जादुई आँकड़ा:- 122 * एनडीए गठबंधन (विजेता):- लगभग 145+ सीटें मिलीं। * जनता दल (यूनाइटेड):- जेडी(यू):- नीतीश कुमार की पार्टी पिछली बार की तुलना में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी करने में सफल रही है, जिससे उनके नेतृत्व को और मज़बूती मिली है। * भारतीय जनता पार्टी (भाजपा):- भाजपा ने भी खुद को एक मज़बूत सहयोगी के रूप में साबित किया है। * अन्य गठबंधन सहयोगी:- हम और अन्य छोटे गठबंधन सहयोगियों ने भी इस जीत में योगदान दिया। * महागठबंधन (पराजित):- लगभग 85-90 सीटों पर रुक गया। * राष्ट्रीय जनता दल (राजद):- तेजस्वी यादव की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनने की दौड़ में थी, लेकिन उसे सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलीं। * कांग्रेस और वामपंथी दल:- उनके नतीजे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। नीतीश कुमार की जीत के मुख्य कारणइस चुनाव में नीतीश कुमार की जीत के पीछे कई अहम कारण रहे, जिसने एक बार फिर उनके राजनीतिक कौशल को साबित किया: 1. ‘साइलेंट वोटर्स’ या महिला मतदाताओं का विश्वास नीतीश कुमार की जीत की एक प्रमुख सूत्रधार बिहार की महिलाएं हैं। * शराबबंदी:- बिहार में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के फैसले ने ग्रामीण महिलाओं के बीच नीतीश कुमार की लोकप्रियता को बढ़ाया है। * पंचायतों में आरक्षण:- पंचायतों और सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का ऐतिहासिक कदम उनके पक्ष में गया है। * साइकिल योजना:- छात्राओं के लिए ‘साइकिल योजना’ ने बिहार की सामाजिक छवि बदल दी, जिसका आभार आज भी बरकरार है। इन महिलाओं को ‘साइलेंट वोटर’ के नाम से जाना जाता है, जिन्होंने बिना किसी चर्चा में आए, मतदान के दिन नीतीश कुमार के पक्ष में बटन दबाया। 2. ‘सुशासन बाबू’ की छवि 2005 से पहले के ‘जंगल राज’ की तुलना में, लोग आज भी नीतीश कुमार के कार्यकाल की बेहतर कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढाँचे (सड़कें, बिजली) को महत्व देते हैं। हालाँकि उन पर ‘थका हुआ’ और ‘कमज़ोर’ होने का आरोप लगाया गया था, फिर भी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने एक स्थिर सरकार के लिए मतदान किया। 3. अटूट जातीय समीकरण बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण काफ़ी महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार ने इस समीकरण को सफलतापूर्वक बनाए रखा है: *लाब-कुश (कुर्मी-प्रश्न):- यह उनका अपना और अटूट वोट बैंक है। *अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी):- नीतीश कुमार इस वर्ग को राजनीतिक महत्व देने वाले पहले व्यक्ति थे। ईबीसी मतदाताओं ने उनका विशेष रूप से समर्थन किया है। *महादलित:- नीतीश कुमार की विभिन्न योजनाओं ने इस पिछड़े वर्ग के लिए भी काम किया है। 4. एनडीए गठबंधन की संयुक्त ताकत इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और भाजपा की मज़बूत संगठनात्मक शक्ति के साथ नीतीश कुमार के अनुभवी चेहरे ने एक अजेय गठबंधन बनाया। जैसे ही भाजपा का कैडर वोट और उसका अपना वोट बैंक, जद(यू) एक साथ आए, महागठबंधन के लिए इसे तोड़ना असंभव हो गया। महागठबंधन क्यों हार गया? हालाँकि तेजस्वी यादव ने ‘रोज़गार’ और ‘बदलाव’ के नारों पर कड़ा संघर्ष किया, लेकिन कुछ कारणों से वे पिछड़ गए: *एम-वाई समीकरण से आगे नहीं बढ़ पाना:- राजद अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (एम-वाई) वोट बैंक के अलावा अन्य समुदायों, खासकर अति पिछड़े वर्गों और महिलाओं के वोट आकर्षित करने में विफल रहा है। *’जंगल राज’ का डर:- कई लोग अभी भी राजद के 15 साल के शासन की यादें नहीं भूले हैं, जो नीतीश कुमार के पक्ष में गया था। *कमज़ोर सहयोगी:- कांग्रेस और वामपंथी दल राजद को हराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाए हैं। 1. नीतीश कुमार का निजी जीवन राजनीति में आने से पहले, नीतीश कुमार का जीवन कुछ अलग था। उनके निजी जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी नीचे दी गई है: जन्म और परिवार:- नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च, 1951 को बिहार के पटना ज़िले के बख्तियारपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम कबीरराज राम लखन सिंह था, जो एक आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। उनकी माता का नाम परमेश्वरी देवी था। उनके पिता के आयुर्वेद के अभ्यास ने उनके अनुशासित जीवन को कुछ हद तक प्रभावित किया होगा। शिक्षा:- वे एक बेहद प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्होंने पटना स्थित बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री प्राप्त की। करियर:- अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, वे बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में शामिल हो गए। लेकिन उनका मन वहाँ नहीं रमा। राजनीति में प्रवेश:- वे जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व वाले ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन से बहुत प्रेरित हुए और 1974 में राजनीति में आने का फैसला किया। इस तरह एक इंजीनियर का राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश हुआ। उपनाम:- उनके करीबी दोस्त और गाँव वाले उन्हें ‘मुन्ना’ कहकर बुलाते थे। 2. नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर और रिकॉर्ड नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव और रिकॉर्डों से भरा रहा है। राजनीतिक जीवन की शुरुआत जेपी आंदोलन:- उनका राजनीतिक जीवन 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के समाजवादी आंदोलन … Read more